Sunday, March 6, 2011

हज़ारों ख्वाइशें ऐसी..........

ख्वाइश थी हम भी कभी बाग़ में चला करते,

फूलों को छेड़ा करते, काँटों पर हँसा करते,
तितलियों से खेला करते, झूलों पर झूला करते,
पर हमे ये मौसम कभी इतना सुहाना न मिला |

प्यार की दरिया में डूबना हम भी चाहते थे,
कुछ हसीं पलों को समेटना हम भी चाहते थे,
किसी की यादों को दिल में संजोना हम भी चाहते थे,
कमबख्त हमे प्यार का कोई बहाना  न मिला |

कभी एक कवि बनने की हसरत थी,
कुछ सुरों में गीत भरने की हसरत थी,
लफ़्ज़ों से दिल छूने की हसरत थी,
धुन तो थी मगर हमे कोई तराना न मिला |

चाहते थे हम भी कुछ कर दिखाएँ,
जूनून और जोश में इस क़द्र डूब जाएँ,
कुछ उम्मीद दे, कुछ कर गुज़र जाएँ,
पर अकेले थे साथ देने को ये ज़माना न मिला |

किसी की यारी में मर मिटने की चाहत,
यारी में दीवाना हो जाने की चाहत, 
यारी पे जान कुर्बान करने की चाहत,
पर हमे कोई शख्स इतना दीवाना न मिला |

कुछ लफ़्ज़ों को यूँ पिरोने की तमन्ना,
कुछ ऐसा शेर लिखने की तमन्ना,
कूट-कूट कर जिसमे ज़िन्दगी भरने की तमन्ना,
पर हमे कोई शेर इतना कातिलाना न मिला |